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स्वावलंबी जीवन | हमारा मन, अन्न, तन, वचन, व्यवहार और हमारा हृदय एकदम पवित्र होता चाहिए |


सभी मनुष्य स्वावलंबी जीवन बिताएं। पवित्र कमाई (अपने पसीने की कमाई) करें, उसी से जीवन निर्वाहन करें। सतोगुणी भोजन करें।

पिता की कमाई खानेवाले का खून खराब हो जाता है!

हमारा मन और अन्न दोनों पवित्र होना चाहिए। साथ ही हमारा तन, वचन और व्यवहार भी पवित्र होना चाहिए। इन सबके मूल में जो सबसे जरुरी है, हमारा हृदय तो पवित्र होना ही चाहिए। 

हृदय पवित्र नहीं है तो अपने पिता (परम प्रभु परमेश्वर) की परछाईं की भी अनुभूति नहीं हो पायेगी। 

संतोषी बनें। थोड़े में भी संतुष्ट रहें। मनोविकारों से दूर रहते हुए अपने हृदय में शील, संतोष, क्षमा, नम्रता, आदि उत्तम विचारों को, सात्विक विचारों को धारण करें।

रैन जागि कर ध्यान | कार्य में सफलता के लिए अनिवार्य है | किसी कार्य की सफ़लता के लिए किन पाँच चीज़ों की आवश्यकता होती है?


किसी कार्य की सफ़लता के लिए किन पाँच चीज़ों की आवश्यकता होती है? जानें!
रैन जागि कर ध्यान | भाग-1 
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण का वचन है कि किसी कार्य की सफलता के लिए पाँच चीजों की आवश्यकता होती है- कर्ता, क्षेत्र, साधन, क्रिया और अज्ञात। 

कर्ता अयोग्य हो और क्षेत्र अनुकूल हो, तो सफलता नहीं मिलेगी। कर्ता योग्य हो और क्षेत्र अनुकूल नहीं हो, तो सफलता नहीं मिलेगी। कर्ता योग्य हो, क्षेत्र अनुकूल हो, किन्तु साधनविहीन हो, तो सफलता नहीं मिलेगी। कर्ता योग्य हो, क्षेत्र अनुकूल हो, साधन संपन्न हो, किन्तु कार्यान्वयन नहीं कर रहा हो, तो भी सफलता नहीं मिलेगी। कर्ता योग्य हो, क्षेत्र अनुकूल हो, साधन संपन्न हो और कार्यान्वयन भी कर रहा हो, तब पाँचवी चीज है- अज्ञात अर्थात प्रभु-कृपा, वह मिल जाती है; फलत: सफलता मुट्ठी में आ जाती है।
पहली बात है कि कर्ता का योग्य होना अनिवार्य है।

परमात्मा कौन है | आत्मा परमात्मा का ज्ञान | परमात्मा का ज्ञान कौन प्राप्त कर सकता है?

ब्रह्म-दर्शनार्थ तीनों पर्दों को पार करना आवश्यक! भाग-3 


हमलोग पुष्प को देखते हैं, परन्तु उसमें व्यापक गंध को नहीं। उसी तरह हम विश्व को देखते हैं, किन्तु विश्व में व्यापक ब्रह्म को नहीं देख पाते।
 
जितनी विद्याएँ हैं, जितने शास्त्र हैं, सभी जूठे हो गए हैं; क्योंकि उसका वर्णन लोग मुँह से करते हैं, परन्तु जो अनंत स्वरूप परमात्मा है, उसका ज्ञान कभी जूठा नहीं होता। 

उस अव्यक्त तत्व को अव्यक्त ही जान सकता है। जैसे हमारी  चौदह इंद्रियों में रूप विषय को आँख ही ग्रहण कर सकती है, शब्द को कान ही ग्रहण कर सकता है; उसी तरह परब्रह्म परमात्मा का ज्ञान हमारी चेतन आत्मा ही ग्रहण कर सकती है।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा- मैं अव्यक्त हूँ, पर जो अज्ञानी लोग है, मुझे व्यक्त मानते हैं|

भगवान का उत्तम रूप कौन है? भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा; मैं अव्यक्त हूँ, पर जो अज्ञानी लोग है, मुझे व्यक्त मानते हैं। वास्तव में जो मेरा अव्यय, अव्यक्त रूप है, वही उत्तम है। 
भगवान कहते हैं कि क्षर और अक्षर; ये दो पुरुष हैं। इन दोनों को के परे हैं- पुरुषोत्तम, वही मैं हूँ।

ब्रह्म-दर्शनार्थ तीनों पर्दों को पार करना आवश्यक! भाग-2


एक यात्री यात्रा के क्रम में एकबार जंगल चला गया। वहाँ उनकी भेंट एक महात्माजी से हुई। उसने महात्माजी से पूछा  'बाबा! बस्ती कितनी दूर पर दूरी पर है?' महात्मा जी ने उत्तर दिया- 'जैसे ही जंगल पार करोगे बस्ती मिल जाएगी।' चलते-चलते जब उसने जंगल को पार किया, तो उसको शमशान घाट मिला। वह लौटकर आता है और महात्मा जी से कहता है- 'बाबा! आपने तो कहा था कि जंगल पार करने पर बस्ती मिलेगी, पर वहाँ तो शमशान घाट मिला।' महात्मा जी ने उत्तर दिया- 'तुम किसको बस्ती कहते हो? बस्ती तो उसको कहते हैं, जहाँ आकर लोग बसते हैं। शमशान में जाकर जो बसते हैं, उसको कोई उजाड़ नहीं सकता है। असली बस्ती तो वही है, जहाँ बसने पर कोई उजाड़ न सके। तुम जिनको बस्ती करते हो, वह तो उजाड़ है। प्रतिदिन मर-मर कर लोग वहीं, श्मशानघाट में जाकर बसते हैं। इसलिए उसको मैंने बस्ती कहा।

परमात्मा सूक्ष्म है | परमात्म प्राप्ति के उपाय | परमात्म दर्शन | परमात्म भक्ति | परमात्म प्रकाश


ब्रह्म-दर्शनार्थ तीनों पर्दों को पार करना आवश्यक | भाग-1| 

यदि पृथ्वीतल से मिट्टी का एक ढेला लेकर हम आकाश की ऊँचाई में ले जाकर छोड़ दें, तो वह आकाश में तबतक चक्कर काटता रहेगा जबतक वह पुनः पृथ्वी से आकर मिल नहीं जाता। 
अंश जब तक अपने अंशी में मिल नहीं जाता, स्थिरता नहीं आती है। 
यह जीव भी अपने अंशी से भी बिछुड़ जाने के कारण अशांत, बेचैन बना हुआ है। 
यह तब तक शांति प्राप्त नहीं कर सकता, जबतक कि जहाँ से इसकी उत्पत्ति हुई है, वहाँ नहीं पहुँच जाए।
वहाँ पहुँचने के लिए रास्ता अपने अंदर है, कहीं बाहर में भटकने की जरूरत नहीं। इसके लिए 
पहले आज्ञाचक्र से सहस्रदल कमल में जाओ, वहाँ से त्रिकुटि, शून्य, महाशून्य और भँवर गुफा होते हुए सतलोक में पहुँच जाओगे। वहाँ प्रभु का दर्शन हो जाएगा। 
इसके लिए पहले समय खर्च करना होगा, साधन-भजन करना होगा। पहले मानस-जप और मानस-ध्यान लगाना होगा; फिर दृष्टियोग की क्रिया करके एकविन्दुता प्राप्त करना होगा। वह विन्दु तुम्हें प्रकाश में पहुँचा देगा। वहाँ जो शब्द मिलेगा, उस केन्द्रीय शब्द को पकड़कर तुम प्रभु के पास निःशब्द में पहुँच जाओगे।

संसार में रहने की कला | वह आन्तरिक मार्ग पर चल नहीं सकता जिसमें बाल के नोक के बराबर भी...

संसार में रहने की कला!



वह आन्तरिक मार्ग पर चल नहीं सकता!!

सभी मानव एक है। 
मानव में एकता होनी चाहिए। 

इसके इसके लिए देश में आध्यात्मिकता ऊँची और उत्तम होनी चाहिए, सदाचारिता ऊँची और उत्तम होनी चाहिए। 

सामाजिक नीति अच्छी होनी चाहिए। तभी राजनीति भी अच्छी होगी और शान्तिदायक होगी। 

अध्यात्म ज्ञान से ही हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। 

एक बाल के नोक के बराबर भी अगर किसी में पाप की वृति रहेगी, तो वह आन्तरिक मार्ग पर चल नहीं सकता। 

साधक का जीवन पवित्र होना चाहिए। पवित्र जीवन जियें, साधन-भजन करें तो कल्याण होगा।

 
एक नायिका कहती है-

दस्त से मैं यार को खाना खिलाती हूँ। 
प्यास लगने पर उसे पेशाब देती हूँ।।

यहाँ भाषान्तर से अर्थान्तर है; इसे समझना होगा।







साधन जानना और करना नहीं, पुण्य तो हुआ; लेकिन पूरा नहीं | महर्षि मेँहीँ | Maharshi Mehi


साधन जानना और करना नहीं, पुण्य तो हुआ; लेकिन पूरा नहीं |
आपलोगों को जो दीक्षा मिली है, उसे सत्य समझिए। 

केवल सत्य समझ कर संतुष्ट नहीं हो जाइए, उसे काम में लाइए। 

यानी साधन-भजन कीजिए। साधन जानना और करना नहीं, पुण्य तो हुआ; लेकिन पूरा नहीं।




महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

🌼 नारी का सम्मान – सृष्टि का अभिमान 🌼 ✍🏻 शिवेन्द्र वह सृजन की धरती है, आशा की किरण। संघर्ष की देवी है, शक्ति की शरण।। स्नेह की गंगा है, म...