Search

ईश्वर भक्ति | एक ईश्वर सबका | एक ही रास्ता | सत्संग-योग का प्रतिनिधित्व


'सत्संग-योग' मेरा प्रतिनिधित्व करेगा |

ईश्वर एक है और ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग भी एक ही है। संसार के सभी तनधारि मनुष्य भक्ति कर सकते हैं। चाहे वे किसी भी देश के हों, किसी भी भेष के हों, किसी भी जाति-धर्म, मजहब, संप्रदाय के हों। भक्ति करने के लिए घरवार, परिवार, रोजगार आदि छोड़ने की भी जरूरत नहीं होती है। अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भगवद्भजन कर सकते हैं। 
संसार के सभी संतों ने साधना-तपस्या करके देख ली और तब उन्हौंने निष्कर्ष निकाला कि भक्ति करने के एकमात्र सरल साधन- विन्दु-ध्यान और नाद ध्यान है।
वेद कहता है- 'नानयः पंथा:।' न अन्यः पंथा: अर्थात कोई दूसरा रास्ता नहीं है। 'तपसः परस्तात्' अर्थात अंधकार के परे प्रकाश में चलो और शब्द को पाओ। यही खुदा या परमात्मा के पास जाने का रास्ता है, अन्य दूसरा रास्ता नहीं है। ईश्वर-कृत जो रास्ते हैं, उनमें परिवर्तन नहीं होता है पर मानव कृत रास्ते बदलते रहते हैं। 
जिस तरह ईश्वर रचित संसार और संसार के सभी मनुष्यों के लिए ईश्वर प्रदत्त शरीर में जो रास्ते जिस काम के लिए है, वही काम होता है, उनमें परिवर्तन नहीं होता है- कान से सुनने का, आँख से देखने का इत्यादि...।
उसी तरह ईश्वर के पास जाने का रास्ता भी एक ही है और वह अंदर का रास्ता है।

द्रौपदी क्यों गिर गयी | कोई न स्थिर सबहिं बटोही | बच्चे जो अनजान होते हैं |

बच्चे जो अनजान होते हैं, तितलियों के पीछे भागते हैं, बड़े लोग इसे देखकर बच्चे को अज्ञानी समझते हैं। हम भी उस बच्चे से कम अज्ञानी नहीं हैं। वह तो तितलियों के पीछे भागता है, जिनमें जान हैं और हम जिनके पीछे भागते हैं, वे सभी- घर, जमीन, दूकान, पैसा आदि जो बेजान हैं।
महर्षि मेँहीँ-पदावली में गुरुदेव (महर्षि मेँहीँ) का वचन है-
कोई न स्थिर सबहिं बटोही।
सत्य शांति एक स्थिर वोही।।
जैसे तितलियों के पीछे भागनेवाले बच्चे को देखकर हम हँसते हैं, उसी तरह संत-महात्मागण संसारी लोगों को देखकर हँसते हैं, जो ज्ञानाभाव के कारण भोगों में मस्त हैं। 

जो गुरुभक्त होने का दम्भ रखते हैं, पर उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं, तो गुरु की कृपा कितनी भी बरसती रहे, पर सफलता नहीं मिलेगी।
गुरु-कृपा की धारा तो बह रही है, जिसके अन्दर जितनी क्षमता होती है, पात्रता होती है, उतनी कृपा मिलती है। जिनका हृदय जैसा रहेगा, वैसा ही गुरु की कृपा का प्रकाश फैलेगा। इसलिए गुरु में श्रद्धा रखनी चाहिए और उनकी आज्ञा का पालन करनी चाहिए। जो अपने इष्ट पर एकनिष्ठ रहते हैं, उनका कभी अनिष्ट नहीं होता है। 
याद रखें अन्तर्मार्ग के पथिकों के लिए अहंकार बहुत बड़ा-भारी दुश्मन है। व्यक्ति के अन्दर अनके तरह के मद्द होते हैं, जबतक इन मद्दों को रद्द नहीं करेंगे, तबतक अनहद नहीं मिलेगा और प्रभु का दर्शन नहीं होगा। अतः अहंकार रहित बनें, हृदय को पवित्र व पाक रखें, मन साफ रखें, गुरु युक्ति से भक्ति करें तो सफलता मिलेगी और प्रभु का दर्शन होगा।

परमात्मा को प्राप्त कर परम कल्याण | सच्चे सद्गुरु | सच्ची सद्युक्ति |


साधक स्थूल के केन्द्र पर शब्द को पकड़ता है, उससे खिंचकर सूक्ष्म के केन्द्र पर जाता है। वहाँ केन्द्रीय शब्द को पकड़कर कारण, महाकारण के केन्द्र पर, महाकारण के केन्द्रीय शब्द को पकड़कर कैवल्य के केंद्र पर पहुँच जाता है, वहाँ का शब्द परम प्रभु परमात्मा तक पहुँचा देता है। फिर...

"निज घर में निज प्रभु को पावै, अति हुलसावै ना। 
'मेँहीँ' अस गुरु संत उक्ति, यम-त्रास मिटावै ना।।" 

अपने घर में अपने प्रभु को पा लेता है और सारे दुःखों से छूट जाता है। 

यह अपने अंदर का रास्ता है, बाहर का नहीं। यह मजहब सीना है, सफीना नहीं। यह दिल का दर्द है, कथनी में नहीं आता। वस्तुतः यह करने की चीज है। 

जिनको सच्चे गुरु मिले हैं, सच्ची सद्युक्ति मिली हुई है और जो सदाचार समन्वित होकर सच्ची साधना कार्य करते हैं, उनको अनुभूतियाँ होती हैं और अंत में परम प्रभु परमात्मा को प्राप्त कर अपना परम कल्याण कर लेता है।

गुरु ईश्वर का रूप हैं | Guru is the form of God. | गुरु महिमा |

गुरु ईश्वर का रूप हैं | Guru is the form of God. | गुरु महिमा |

मानव बहुत भटक चुका है, भटक रहा है और ये तबतक भटकता रहेगा, जबतक किसी ज्ञानी गुरु, सत्पुरूषों से मिलकर, उनसे सद्युक्ति प्राप्त कर अपने आत्मस्वरूप की पहचान कर सत्वस्वरूप की पहचान नहीं कर लेता। 

वर्षा प्रायः होती है, किन्तु स्वाति की बूँद कभी-कभी गिरती है। उसी संसार में लोग जन्म लेते रहते हैं और लेते रहेंगे; लेकिन संत महापुरूषों का जन्म कभी-कभी, कहीं-कहीं होता है। 

सामान्य जल वर्षा होने से खेती लहलहाती है, किन्तु स्वाती बूंद तो मोती ही बनाती है। उसी तरह सामान्यजन के जन्म लेने जनसँख्या बढ़ती हैं और संत महापुरुष अवतार लेकर वे हीरा-मोती की खेती करते और कराते हैं। 

संत कबीर साहब ने भी खेती की: सतनाम की; 'मन का बैल और सुरत का हरवाहा'। उन्होंने सत्तनाम का बीज बोकर हीरा-मोती उपजाया और मालामाल हो गए। 

हमरे सत्तनाम धन खेती।।
मन के बैल सूरत हरवाहा, जब चाहै तब जोती।
सत्तनाम का बीज बोवाया, उपजै हीरा मोती।।
उन खेतन में नफा बहुत है, संतन लूटा सेंती। 
कहे कबीर सुनो भाई साधो, उलटी पलटी नर जोती।।

याद रखें, संत सद्गुरु कोई वेश-विशेष के कारण नहीं होते; गुरु नाम है ज्ञान का। शब्द का दाव बतलाने वाले आध्यात्मिक गुरु होते हैं और लौकिक गुरु वे होते हैं जो लौकिक विद्या सिखलाते हैं, जिससे हम संसार में आराम से खाये, पिये और रहें। लेकिन शरीर छूटने के बाद का जीवन सुखमय कोसे होगा? इसके लिए आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता है। 
सच्चे संत सद्गुरु कल्पवृक्ष होते हैं। उनके पास श्रद्धावन्त होकर जाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती है; अगर आपकी कामना- शुभकामना है, शुभेच्छा है, तो वे उनकी पूर्ति कर देंगे। 

संतवाणी | संतवाणियों के अनुकूल चलें | संतों का भेद और पंडितों का वेद |

कोई भी मनुष्य भक्ति के लिए, वर्णभेद से, जाति-भेद से या देश-भेद से कोई योग्य है वा कोई इसके अयोग्य नहीं है; किन्तु हाँ, आचरण-भेद से योग्य वा अयोग्य अवश्य है। 

यदि मनुष्य में 'संतों का भेद और पंडितों का वेद' दोनों है, तो सोने में सुगंध है। 

भक्ति करने वाले सब भेषों में रहकर भजन कर सकते हैं, नहीं करने वाले किसी भेष में भी रहकर नहीं कर सकते हैं। जो इन्द्रियों के स्वाद में नहीं फंसता वह गृहस्थ होते हुए भी योगी हैं।

कोई भी मनुष्य अच्छा है या बुरा यह उनके कर्म से पता चलता है, उनका रहन-सहन, बोली, व्यवहार कैसा है, इसी से उनके भक्त और अभक्त होने का पता चलता है। चाहे उनका भेष-भूषा कोई भी हो।

प्रत्येक मनुष्य को भीतर से धार्मिक होना चाहिए। मानव शरीर में रहते हुए मानवोचित कर्म ही करना चाहिए। अन्यथा उनमें और अन्य हिंसक योनि वाले शरीरधारियों में क्या अन्तर रह जाएगा। 

धर्म परिवर्तन नहीं, मन परिवर्तन होना चाहिए। 

साधकों के लिए आवश्यक; सादगी और सरलता | प्रतिष्ठा की चाह नहीं | नीच न सोहत मंच पर |

साधकों के लिए आवश्यक है, सादगी और सरलता। प्रतिष्ठा की चाह उनमें नहीं होनी चाहिए।

"नीच न सोहत मंच पर, महि पर सोहत धीर। 
काक न सोहत पाक पर, हंस सजे सर तीर।।"
सद्गुणी व्यक्ति नीचे बैठे रहने पर भी सुशोभित होते हैं, आदर पाते हैं। परन्तु जो सदाचरण-हीन है, वह ऊँचे आसन पर बैठकर भी शोभाहीन ही होता है। जिस तरह कागा के ऊँचे भवन पर बैठ जाने से शोभा नहीं देता है। वह काँव-काँव ही करता रहता है और लोग उसे भगा देते हैं। दूसरी ओर हंस मानसरोवर के किनारे नीचे बैठा रहता है, तब भी वह शोभता है। वह मीती खाता है और दूध में पानी मिला होने पर भी केवल दूध पीता है, पानी को छोड़ देता है। यह संसार जड़-चेतन मिश्रित है, गुण-दोष मिश्रित है। जो ज्ञानवान होते हैं, संतजन होते हैं, वे दूध लेते हैं और पानी छोड़ देते हैं यानी सत्य को ग्रहण करते हैं और असत्य को त्याग देते हैं। 
जल से कमल की उत्पत्ति होती है, पर जल उसे डूबा नहीं सकता है। जल ऊपर उठकर डूबाना भी चाहता है तो कमल ऊपर उठता जाता है और पूरी तरह से खिलकर जल की शोभा को और बढ़ाता है। इसी तरह संसार में रहना चाहिए, दूसरे को अपने सद्गुणों से गुणान्वित करते रहें।
इंसान के लिए कम खाना और गम खाना हितकर है।'
'मन महीन कर लीजिए, तब पिउ आवै हाथ।'
अपने को छोटा बनाइये, अहंकार को त्याग दीजिए, तभी परमात्मा को पा सकते हैं।

एक ईश्वर ही सत्य है | अपनी दुर्गति से बचें | सद्गति प्राप्त करें | इसी जीवन में |

कोई भी लौटकर नहीं आया !

ईश्वर एक है, अनेक नहीं। यह संसार उन्हीं का बनाया हुआ है। हमसब मानव जो यहाँ पर जाति-धर्म, सम्प्रदाय में बंटे हुए हैं, ऊंच-नीच के भेद-भाव से पीड़ित हैं, उन्हीं के संतान हैं। हमसब को एक -न -एक दिन उन्हीं के पास जाना है। हमारे पूर्वज सब -के-सब जा चुके हैं। उनका क्या समाचार है? वे किस हालत में हैं? किस परिस्थित में है? वे किस तरह रह रहें हैं? हमें कुछ भी मालूम नहीं है। वे सब -के -सब यहाँ इस संसार में जब थे तो बहुत कुछ धन-सम्पत्ति इकठ्ठा किए थे, रिश्ते-नाते बनाए, परन्तु सब कुछ यहीं पर छोड़कर चले गए, कुछ भी साथ में लेकर नहीं गए। 
हमसब के असली पिता एक ही है  "परमपिता परमेश्वर"। हमसबको भी एक- न- एक दिन अपने पिता के पास जाना ही है। लेकिन जाकर भी हम उनसे तभी मिल पायेंगे, जब हम उनकी भक्ति इस जीवन में करेंगे, जिस जीवनको हम अभी जी रहे हैं, यही अवसर हमारे पास है। और ये काम मनुष्य-शरीर में ही हो सकता है। भक्ति करने से ही ईश्वर-दर्शन होगा; अन्यथा परमपिता के दर्शन भी नहीं हो पायेंगे। 
अतः बहुत जरूरी है कि हम इस जीवन, जो जीवन हमें अभी मिला हुआ है, अच्छे-अच्छे कर्म करें, भक्ति करें और अपने पिता से जा आनन्द से मिलें, ऐसा करने से हमसब अपने दुर्गति से बच सकते हैं। और सद्गति को प्राप्त कर पायेंगे। यही जीवन का सार है। मानव-जीवन का उद्देश्य है। यही हमारी असली कमाई है। यही हमारे साथ भी जायेगा। इसी से परम पिता खुश होकर हमें अपने हृदय में समाहित कर लेगें। फिर कभी न नाश होने वाले अचल अमर सुख की प्राप्ति हो जायेगी।  क्रमशः...

महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

🌼 नारी का सम्मान – सृष्टि का अभिमान 🌼 ✍🏻 शिवेन्द्र वह सृजन की धरती है, आशा की किरण। संघर्ष की देवी है, शक्ति की शरण।। स्नेह की गंगा है, म...